बहुत समय पहले की बात है, जब पंजाब की धरती हरियाली, खेतों और बहादुर लोगों के लिए जानी जाती थी। उसी समय मुग़ल शासक अकबर का शासन था। इस दौर में अमीर और ताक़तवर लोग गरीबों पर अत्याचार करते थे। कई इलाकों में बेटियों को जबरन बेचना, उनसे जबरन शादी कराना और परिवारों को डराना आम बात हो गई थी। इसी अन्याय के समय पंजाब की धरती पर जन्म हुआ एक वीर योद्धा का — दुल्ला भट्टी।
👧 सुंदर-मुंदर की करुण कथा एक गाँव में दो अनाथ बहनें रहती थीं — सुंदर और मुंदर। वे बहुत गरीब थीं और उनकी रक्षा करने वाला कोई नहीं था। गाँव का एक क्रूर ज़मींदार उन्हें जबरन बेच देना चाहता था। जब यह बात दुल्ला भट्टी को पता चली, तो उसका खून खौल उठा। वह रात के अंधेरे में गाँव पहुँचा, ज़मींदार को सबक सिखाया और दोनों बहनों को अपने साथ ले आया।
भाई बनकर किया कन्यादान दुल्ला भट्टी ने सुंदर और मुंदर की शादी अच्छे घरों में तय की। लेकिन समस्या यह थी कि कन्यादान कौन करेगा? तब दुल्ला भट्टी ने कहा: “आज से मैं इनका भाई हूँ।” उसने अग्नि को साक्षी मानकर, नारियल और गुड़ को प्रतीक रूप में देकर उनका विवाह करवाया। यही कारण है कि लोहड़ी में आज भी अग्नि को केंद्र में रखा जाता है।
लोकगीतों में अमर हो गया नाम इन विवाहों के बाद गाँव-गाँव में दुल्ला भट्टी की वीरता के गीत गाए जाने लगे। लोग गाने लगे: “सुंदर मुंदरिए हो! तेरा कौन विचारा हो? दुल्ला भट्टी वाला हो!” धीरे-धीरे यह गीत लोहड़ी के लोकगीत
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